UjjainMP

पंचक्रोशी की यात्रा

पंचक्रोशी...118 किमी की ऐसी यात्रा जो ऊर्जा देती है

पुराणों में उज्जैयिनी की करीब 30 परिक्रमाओें का उल्लेख आता है। इनमें पंचेशनी (पंचक्रोशी) की यात्रा आज भी लोकप्रिय है। इस यात्रा में मालवा के निकटवर्ती क्षेत्रों के लाखों ग्रामीण श्रद्धापूर्वक भाग लेते है।

सनतन परंपरा - वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी से यह यात्रा प्रारंभ की जाती है। इसे अनुलोम-प्रतिलोम विधि से करने का विधान है। इसमें रूद्रसागर में स्नान कर महाकाल के दर्शन कर पटनी बाजार की मोदी की गली में स्थित ईशानेश्वर महादेव मंदिर से चलकर एक द्वार स्थित लिंग पर जाकर दर्शन कर वापस लौट आते है। दूसरे दिन पुनः ईशानेश्वर से यात्रा कर दूसरे द्वारा स्थित लिंग के दर्शन कर पुनः लौट आते है। प्राचीन काल में यह यात्रा इसी प्रकार जाती थी।

वर्तमान में- वर्तमान में इस यात्रा का स्वरूप बदल चुका है, अब यह यात्रा क्षिप्रा स्नान कर महाकालेश्वर की दर्शन कर पटनी बाजार स्थित नागचन्द्रेशर के दर्शन कर प्रारंभ की जाती है, उपरांत के प्रथम दिन पिंगलेश्वर, द्वितीय दिन कायावरोहश्वर, तृतीय दिन बिलवेश्वर, चतुर्थ दिन दुद्रृधेश्वर, पांचवे दिन पिंगलेश्वर होकर परिक्रमा पूर्ण कर पुनः उज्जैन आकर समाप्त होती है। इस दौरान यात्रा में पडने वाले प्रत्येक पड़ाव पर प्रशासन द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए व्यवस्थाएं जुटाई जाती है। इस प्रकार श्रद्धालु 118 किमी का सफर कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।

यह यात्रा लोक जीवन, धर्म और संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। इस यात्रा का उल्लेख स्कन्दपुराण के अवन्तिखण्ड में मिलता है, जिसके अनुसार महाकाल वन के चारों दिशाओं में चार द्वार हैं -पूर्व में पिंगलेश्वर, पश्चिम में विल्वकेश्वर, उत्तर में दुर्दरेश्वर और दक्षिण में कायावरोहणेश्वर। पंचक्रोशी यात्रा में तीर्थयात्रा उज्जैन की परिक्रमा करते हैं, पटनी बाजार स्थित श्री नागचन्द्रेश्वर के दर्शन से यह यात्रा प्रारंभ होती और पांच दिन में 118 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर क्षिप्रा के तट पर विश्राम कर अष्टाविंशति तीर्थ यात्रा पूरी करते हैं। यात्रा वैशाख कृष्ण पक्ष दशमी को शुरू होती है और अमावस्या को समाप्त होती है।

दन्तकथाएँ कहती है कि नागचंडेश्वर महादेव (शिवलिंग) के दर्शन करने से तीर्थयात्री शिवनिर्माल्य उल्लंघन के महापापों से मुक्त हो जाते हैं। यात्रा के यात्री एकादशी के दिन पिंगलेश्वर मंदिर पहुँचते हैं। यह यात्रा का पहला दिन होता है। वे यहां 81 वें महादेव की पूजा करते हैं। यह आस्था है कि पंचक्रोशी यात्रियों को समृद्धि और बुद्धिमत्ता का आशीर्वाद मिलता है। स्वर्ग में स्थित धर्मराज भी उन्हें मान लेते हैं। द्वादशी को यात्री 82वें महादेव कायावरोहणेश्वर की पूजा करते हैं। पुराणों में कहा गया है कि इस पूजन से व्यक्ति सभी पापों से तो मुक्त होता है, जीवन-मरण के चक्र से भी छूट जाता है। उसे स्वर्ग में स्थान मिलता है। इसे बाद यात्रीगण के मार्ग में नलवा उप-पड़ाव आता है जहाँ यात्री विश्राम करते हैं। अम्बोदिया में विल्वकेश्वर महादेव मंदिर है। जैथल से यहाँ गंभीर नदी का पानी कालियादेह महल तक जाता है कालियादेह महल पर क्षिप्रा नदी के 52 कुण्ड है एवं यह स्थान बहुत ही मनोरम है। और 84वें महादेव दारदुरेश्वर को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते है।

किंवदंतियों के अनुसार यह वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को पूजन करने से तीर्थयात्रियों के पूर्वजों को भी मुक्ति मिल जाती है। अमावस्या को यात्री उज्जैन पहुँचते हैं। दिनभर की 25 तीर्थ यात्रा के बाद वे एक बार फिर नागचन्द्रेश्वर महादेव की पूजा करते हैं। यात्रा में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की संख्या कहीं अधिक होती है। ती्रर्थयात्री अपने साथ सारा जरूरी सामान ले जाते हैं और पूरी तरह आत्मनिर्भर होते हैं। वे यात्रा में कई स्थानों पर रूकते हैं और भजन गाते हैं।

पड़ाव एवं यात्रा मार्ग की दूरी

  • नागचंद्रेश्वर से पिंग्लेश्वर महादेव पड़ाव -12 कि.मी.
  • पिंग्लेश्वर से कायावरूपेश्वर महादेव पड़ावह -23 कि.मी.
  • कायावरूपेश्वर से नलवा उप पड़ाव -21 कि.मी.
  • नलवा उप-पड़ाव से बिल्केश्वर महादेव पड़ाव -06 कि.मी.
  • बिल्केश्वर (अम्बोदिया) से कालियादेह उप-पड़ाव -21 कि.मी.
  • कालियादेह से दुर्दरेश्वर महादेव पड़ाव (जैथल) -12 कि.मी.
  • दुर्दरेश्वर पड़ाव से उंडासा उप पड़ाव -16 कि.मी.
  • उंडासा उप पड़ाव से क्षिप्रा तट (रेती घाट) - 12 कि.मी.

ग्रामीण इस यात्रा को एक उत्सव के रूप में मनाते है। कई तीर्थयात्री यात्रा के दौरान सड़क के किनारे पत्थरों को ढेर लगाते देखें जा सकते है। यह मिथक है कि ऐसा करने से अगले जन्म में उन्हें रहने को भव्य इमारतें मिलेंगी। उज्जैन की परिक्रमा के साथ 84 महादेवों की परिक्रमा भी कर लेते हैं। इन 84 महादेवों के दर्शन से 84 लाख योनियों में जन्म लेने से उनका छुटकारा हो जाता है।

लाखों श्रद्धालु चिलचिलाती धूप में 24 किलोमीटर प्रतिदिन चलते हैं। हालांकि उनके चेहरे पर थकान की एक रेखा भी नहीं मिलती। अपने वर्ग, वंश और जाति को भुलाकर वे सिर्फ ईश्वर भक्त हो जाते हैं। यहां तक कि भीड में उनके नाम व पहचान भी अप्रसांगिक हो जाते हैं। तीर्थयात्री पंचक्रोशी यात्रा को बिना किसी लौकिक अथवा अलौकिक उद्देश्य से पूरा करते हैं। यात्रा की एक अन्य विशेषता यह है कि आमतौर पर इसमें साधुओं की कोई भागीदारी नहीं होती। हालंाकि कुछ साधु यात्रा में भाग लेते हैं पर वह भी ग्रामीणों के निवेदन पर।

जिला पंचायत पंचक्रोशी यात्रा की समस्त व्यवस्थाएं करता है। पंचक्रोशी यात्रियों की सुरक्षा से लेकर पड़ाव पर ठहरने, पानी एवं स्वास्थ्य संबंधी सभी प्रकार की व्यवस्था जिला पंचायत को करना होती है। यात्रा मार्ग पर रियायती मूल्य की वस्तुओं की दुकानें लगाकर प्रबंध में योगदान देता है। दुग्ध संघ हर पड़ाव पर दूध उपलब्ध कराता है। इसी प्रकार पेयजल और चलित चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था भी हो जाती है। पंचक्रोशी यात्रा से संबंधित सभी कार्य एवं व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी जिला पंचायत की होती है। जिला पंचायत सीईओ के मार्गदर्शन में पंचक्रोशी यात्रा का सफलतापूर्वक संचालन होता है। इसमें यात्रा प्रारंभ से लेकर पड़ाव, उप पड़ाव से लेकर टेंट, खाद्यान्न सामग्री आदि की व्यवस्था भी जिला पंचायत द्वारा की जाती है। जिला पंचायत सीईजओ निलेश पारिख के अनुसार यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो इसका विशेष ध्यान रखा जाता है।

  • प्रतिवर्ष होने वाली यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण श्रद्धालु भाग लेते हैं।
  • यात्रा में सम्पूर्ण भारत वर्ष विशेषतः मालवा, निमाड़, एवं राजस्थान के श्रद्धालु भाग लेते हैं।
  • सामान्यत- पंचक्रोशी यात्रा में लगभग 50 से 60 हजार यात्री सम्मिलित होते हैं।
  • कुछ श्रद्धालु नंगे पैर भी यात्रा करते हैं।
  • अधिकतर यात्री पड़ाव स्थलों पर ही विश्राम करते हैं, तथा मालवी भोजन (दाल-बाटी) तैयार कर ग्रहण करते हैं।

पंचक्रोशी यात्रा में संभावित व्यय


1 अस्थाई टेंट व्यवस्था (सात पड़ावों पर) 11.00 लाख रु.

2 अस्थाई प्रकाश व्यवस्था (सात पड़ावों पर) 08.00 लाख रु.

3 अस्थाई शौचालय व्यवस्था (सात पड़ावों पर) 07.50 लाख रु.

4 पड़ाव स्थलों को साफ-सफाई 1.50 लाख रू.

5 फ्लेक्स एवं बेनर 0.50 लाख रू.

6 पेयजल (सात पड़ावों पर) 0.50 लाख रू.

7 भूमि समतलीकरण व भराव कार्य 0.50 लाख रू.

8 पुताई व लेखन कार्य 0.40 लाख रू.

9 श्रद्धालुओं का बीमा 0.15 लाख रू.

पंचक्रोशी यात्रा वैशाख कृष्ण दशमी से प्रारम्भ होकर वैशाख मास की अमावस्या को समाप्त होती है। क्षिप्रा स्नान के पश्चात श्रद्धालु पटनी बाजार स्थित श्री नागचन्द्रेश्वर महादेव के दर्शन कर यात्रा प्रारंभ करते है।

पंचक्रोशी यात्रा प्रारंभ स्थल - श्री नागचंद्रेश्वर महादेव पटनी बाजार
मान्यताओं के अनुसार तीर्थ यात्री सर्वप्रथम नागचंद्रेश्वर मंदिर जो उज्जैन नगर के पटनीबाजार में स्थित है, पूजा कर 118 कि.मी. लम्बी यात्रा हेतु बल (शक्ति) प्राप्त कर यात्रा प्रारंभ करते है।

प्रथम पड़ाव - पिंग्लेश्वर: यह पड़ाव 55 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित होना अनुमानित है। ग्राम पिंगलेश्वर यात्रा प्रारंभ स्थल नागचंद्रेश्वर मंदिर उज्जैन से 12 कि.मी. की दूरी पर है।

द्वितीय पड़ाव- करोहन: प्रथम पड़ाव पिंगलेश्वर से 23 कि.मी. दूरी पर ग्राम करोहन में द्वितीय पड़ाव। इसी पड़ाव पर द्वितीय द्वारपाल कायावरोहणेश्वर मंदिर स्थित है। यह पड़ाव लगभग 25 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित होना अनुमानित है। अधिक दूरी होने के कारण तीर्थ यात्राी मार्ग में त्रिवेणी घाट (शनि मंदिर) पर विश्राम कर आगे बढ़ते है। शनि मंदिर (त्रिवेणी घाट) पर पंचक्रोशी यात्रा के दौरान टेण्ट एवं स्नान हेतु फव्वारों की अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जाती है।

उप पड़ाव- ग्राम नलवा: मार्ग में द्वितीय एवं तृतीय पड़ाव के मध्य उप पड़ाव ग्राम नलवा है, जो करोहन से 21 कि.मी. दूर। यह पड़ाव 25 हेक्टेयर में विस्तारित होना अनुमानित है। इस उप पड़ाव पर भी श्रद्धालुओं के लिए अन्य पड़ाव की भांति जिला पंचायत द्वारा समस्त मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।

तृतीय पड़ाव - अम्बोदिया: बिलकेश्वर मंदिर, अम्बोदिया करोहन से 27 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। ग्राम अम्बोदिया में तृतीय द्वारपाल बिलकेश्वर मंदिर स्थित है। यह पड़ाव 15 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित होना अनुमानित है। यह पड़ाव स्थल अम्बोदिया गंभीर बांध के समीप स्थित है। यात्रा के समय जलाशय में पानी होने के कारण अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्थाएं की जाती है।

उप पड़ाव- ग्राम कालियादेह: मार्ग में तृतीय एवं चतुर्थ पड़ाव के मध्य उप पड़ाव ग्राम कालियादेह है जो अम्बोदिया से 21 कि.मी. दूर। यह पड़ाव 20 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित होना अनुमानित है। इस उप पड़ाव पर भी श्रद्धालुओं के लिए अन्य पड़ाव की भांति समस्त मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।

चतुर्थ पड़ाव- जैथलः तृतीय पड़ाव अम्बोदिया से 28 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। पड़ाव पर दुर्दरेश्वर महादेव मंदिर। यह पड़ाव लगभग 15 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तारित होना अनुमानित है।

पंचम पड़ाव- उण्डासा: चतुर्थ पड़ाव स्थल जैथल से लगभग 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित। यात्री उण्डासा में विश्राम कर पिंगलेश्वर होते हुए वापस नगर प्रवेश करते हे। यह क्षेत्र लगभग 20 हेक्टेयर विस्तारित होना अनुमानित है। उण्डासा से रेतीघाट (क्षिप्रा, लगभग 12 कि.मी.) पर यात्रा समाप्त होती है।